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Essay on White Revolution (Operation flood) in Hindi

सफेद क्रांति पर निबंध/ Essay of white revolution( operation flood)

दूध के बारे में जागरूकता बढ़ाने और वैश्विक भोजन के रूप में इसके महत्व को बढ़ाने के उद्देश्य से 1 जून को दुनिया भर में विश्व दूध दिवस- world milk day  मनाया जाता है।  क्या आप जानते है कि आज 150 मिलियन टन उत्पादन के साथ भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। जबकि आजादी के समय भारत एक दूध आयात करने वाला देश था। फिर दूध की कमी वाले देश से हम दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक देश कैसे बन गये? यह सम्भव हुआ 70 के दशक में आरम्भ हुई – सफेद क्रांति के कारण, जिसे operation flood भी कहा जाता है।

सफेद क्रांति क्या है’?

सफेद क्रांति जिसे Operation Flood के नाम से भी जाना जाता है, दुनिया के सबस बडे‌ ग्रामीण विकास के कार्यक्र्मों मे से एक है। ऑपरेशन फ्लड भारत के राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) द्वारा शुरू किया गया एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम 1 970 में लॉन्च किया गया था, जिसका मुख्य लक्ष्य डेयरी उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाना था। यह दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम था। लगभग बीस साल (1975-1995)  साल तक चले इस सतत कार्यक्रम के  परिणामस्वरूप  भारत दूध की कमी वाले देश से दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक देशों में से एक बन गया। और इसलिए इसे भारत की white revolution भी कहा जाता है। operation  flood  के मुख्य लक्ष्य थे:

  1. दूध उत्पादन  की वृद्धि (“दूध की बाढ़”)
  2.  ग्रामीण आय को बढाना
  3. उपभोक्ताओं के लिए उचित कीमतें

“ऑपरेशन फ्लड को ग्रामीण विकास विजन की पुष्टि करने वाले बीस साल के प्रयोग के रूप में देखा जा सकता है”

–विश्व बैंक रिपोर्ट 1997 सी।

सफेद क्रांति के जनक : श्री वर्गीस कुरियन (26 नवंबर 1 9 21 – 9 सितंबर 2012), को भारत में ‘व्हाइट क्रांति का पिता’ कहा जाता है।  ग़ुजरात के आणंद मेंं स्थानीय किसानों को जब दूध का उचित मुल्य नही मिल पा रहा था, तब  सरदार बल्लभ भाई पटेल के पहल पर गुजरात के कैरा और आणद के किसानों के समूह से 1949 में अमूल नामक को- ओपरेटिव की स्थापना की गयी।  आज यही अमूल आज न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया में एक जाना पह्चाना ब्राड बन चुका है। वर्गीस कुरियन ने  उन्होंने अमूल के अध्यक्ष और संस्थापक के रूप में विपणन, खरीद और दूध और दूध उत्पादों की प्रसंस्करण  प्रक्रिया  को  नियंत्रित किया। जिसके  परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान की गई कीमत का 70-80% डेयरी किसानों को नकद के रूप में जाने लगा। जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार आया।

कुरियन ने अपने दोस्त एच एम दलाया के सहयोग से भैंस के दूध से दूध पाउडर और संघनित दूध( skimmed milk)  बनाने की प्रक्रिया का आविष्कार किया। कई कंपनियों को उनके नेतृत्व में शुरू किया गया था। पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमूल के प्रबंधन, संसाधन और आधारभूत संरचना व्यवस्था के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। उनके नेतृत्व मे ही ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम की पहल की जो कि  अमूल के प्रयोगात्मक पैटर्न पर आधारित था।ऑपरेशन फ्लड का मूल आधार गांवों के दूध उत्पादक किसानों की सहकारी समितिया रही है, जिनके माध्यम से दूध खरीदा, बेचा जाता और marketing की सेवाये प्रदान की जाती है ये समितिया ( co-operatives) किसानों को आधुनिक प्रबंधन और प्रौद्योगिकी के बारे में सेवाये उपलब्ध  कराती है।

भारत में व्हाइट क्रांति के चरण क्या थे?

कार्यक्रम कार्यान्वयन

ऑपरेशन फ्लड तीन चरणों में लागू किया गया था।

चरण I : चरण I (1 970-19 80) को विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से वित्त पोषित किया गया था| स्किम्ड दूध पाउडर और मक्खन तेल की बिक्री द्वारा । अपने पहले चरण के दौरान, ऑपरेशन फ्लड ने भारत के चार प्रमुख महानगरीय शहरों: दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में उपभोक्ताओं के साथ भारत के प्रमुख मिल्कशेडों में से 18 को जोड़ा।

चरण  II :–   1981 से 1985 तक दूसरा चरण चला। इस अवधि में मिल्क्शेदों की संख्या 18 से बढ्कर 136 हो गयी। 290 शहरी बाज़ारों में दूध के आउट्लेट का विस्तार हो चुका था। 1985 के अंत तक  43000 ग्रामीण को आपरेटिव की एक आत्म निर्भर नेटवर्क तैयार हो गया जिससे   चालीस लाख से अधिक दूध उत्पाद्क किसानो जुडे हुए थे।

चरण III :-    (1 985-1996) ने डेयरी सहकारी समितियों को दूध की मात्रा में वृद्धि और बाजार की खरीद के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने में सक्षम बनाया। सहकारी सदस्य किसानो को पशुओं की  प्राथमिक चिकित्सा, स्वास्थ्य देखभाल, पौश्टिक चारा, आदि  सेवाए प्रदान दी गयी तथा उन्हें इसके बारे में शिक्षित भी किया गया।ऑपरेशन फ्लड फेज III ने भारत के डेयरी सहकारी आंदोलन को समेकित किया, 1 988-89 में मिल्कशेड 173 तक पहुंच गए और महिला सदस्यों और महिलाओं की डेयरी सहकारी समितियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।चरण III ने पशु स्वास्थ्य और पशु पोषण में अनुसंधान और विकास पर जोर दिया। नये अनुसंधान जैसे Theileriosis की वैक्सीन, bypass protein feed , सभी ने दुग्ध पशुओं की उत्पादकता बढाने में योगदान दिया।

इस समग्र और बहुआयामी रणनीति का ही परिणाम था कि न केवल बाजार की आपूर्ति अप्रभावित रही  बल्कि डेयरी किसानों को सही कीमतें मिलीं,  मुख्य सिद्धांत जिस पर ऑपरेशन – फ्लड ने  काम किया था, यह था कि संपूर्ण मूल्य श्रृंखला – खरीद से विपणन तक – छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसानों को  केंद्र मे रखकर काम किया जाना  चाहिए।

इस प्रकार सफेद क्राति के कारण भारत न केवल दूध उत्पादन में दुनिया में पहले स्थान पर आ गया, अपितु यह एक ग्रामीण विकास का सफल कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इसके माध्यम से किसानों को रोजगार बढ्ने के साथ -साथ उनकी आय भी बढी। उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ।

 

 

 

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गंगा दशहरा का महत्व और कहानी

ग़ंगा दशहरा का महत्व और कहानी

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चित्र साभार : गूगल

गंगा नदी को पवित्र और दिव्य नदी माना जाता है, हिंदू धर्म में इसे सिर्फ एक नदी ही नहीं, अपितु इस नदी को एक मॉ का स्थान दिया गया है। पुराणों और वेदों मेंं गंगा नदी को मोक्षदायिनी कहा गया है। गंगा का भारतीयों के जीवन में पौराणिक, ऐतिहासिक,धार्मिक और आर्थिक रूप से बहुत महत्व है। गंगा का पानी बहुत पवित्र माना जाता है और सभी हिंदू अनुष्ठानों के लिए हर किसी द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

पौराणिक हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि मा गंगा जेठ मास के शुक्ल पक्ष की दसवी तिथि को स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थी। अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार इस साल यह शुभ तिथि आज के दिन 24 मई 2018 को पड़ रही है। इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है।

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क्या है गंगा दशहरा पर्व का महत्व और क्यों मनाया जाता है यह पर्व?

माना जाता है कि इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था।पुराणों में वर्णित है कि इसी दिन सुर्यवंशी राजा भगीरथ की बहुत कठिन तपस्या के बाद मॉ गंगा को नदी स्वरूप मे स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर लाने का मानवकल्याण रुपी कार्य पूर्ण हुआ था।तभी से हर साल गंगादशहरा के पावन अवसर पर गंगा पूजा के साथ कई संस्कार,रीतियों और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि गंगा दशहरा के अवसर पर्व पर माँ गंगा में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैसे तो गंगा स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुःखों से मुक्ति पा जाता है। गंगा दशहरा के दिन दान पुण्य का विशेष महत्व है।

गंगा के अवतरण की पौराणिक कहानी

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में सगर नाम के राजा हुए। राजा सगर की दो रानिया थी- केशानी और सुमति। दोनों मे से किसी भी रानी से राजा की कोई संतान न थी। संतान प्राप्ति के लिये राजा सगर ने कई यज्ञ, अनुष्टठान किये। जिसके फलस्वरूप रानी केशानी से एक पुत्र प्राप्त हुआ-असमजस और दूसरी रानी सुमति ने साठ हज़ार पुत्रों को जन्म दिया। कुछ साल बाद राजा सगर ने अपने राज्य विस्तार के लिये अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। प्रचलित यज्ञ विधान के अनुसार अश्व (घोडा) को पडोसी राज्यो की सीमाओंं की और खुला छोड दिया जाता था । यदि यज्ञ के अश्व को किसी अन्य राजा की सेना ने पकड लिया तो उसे युद्ध करना पड्ता था। और युद्ध में जो विजेता होता था उसका पराजित राज्य पर अधिकार हो जाता था। इस प्र्कार राजा सगर ने सभी राजाओं को बताने के लिये अश्व को मुक्त विचरण के लिये छोड दिया। यज्ञ की रक्षा का भार उनके साठ हज़ार पुत्रों ने संभाला। इंद्र देव नही चाह्ते थे कि यह यज्ञ सफल हो इस्लिये उन्होने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था. परिणामतः सगर के साठ हजार पुत्रों ने अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ ‘महर्षि कपिल’ वहा तपस्या कर रहे हैं. उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है. उन्हें देखकर वे ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगे और उनका ध्यान भंग कर दिया।

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई. ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सभी 60,000 पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गये। सगर के वंसज श्रापित हुए अपनेे पुर्वजों की मुक्त्ति का बहुत प्रयास किया। परन्तु किसी से यह सम्भव नही हुआ। आगे जाकर राजा सगर के वंश मेंं राजा भगीरथ उत्पन्न हिए ।

भगीरथ ने मृत पूर्वजो का श्राद करके उनका उद्धार कंरने का निश्चय किया। परंतु इस कार्य के लिये प्रयाप्त जल उपलब्ध नही था क्युकि श्राप के प्रभाव से जल के श्रोत भी सुख चुके थे। राजा भगीरथ ने अपने मृत पूर्वजों के उद्धार के लिये तथा प्रजा को अकाल से मुक्ति दिलाने के सैकडो वर्षो तक कठोर तप किया। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने ‘गंगा’ के धरती पर अवतरण की इच्छा प्रकट की।

इस पर ब्रह्मा ने कहा- ‘राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है. इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए.’ महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया

उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा. तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं. इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका।

अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई. उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया. तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया. इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी. इस प्रकार . गगा की पवित्र धारा के प्रवाह में सभी भगीरथ के सभी पूर्वजों की राख बह गयी और उन्हे श्राप से मुक्ति मिल गयी। मा गंगा के अवतरित होने सेे धरती फिर सेे हरी- भरी और उपजाऊ हो गयी और प्रजा भी सुखी हो गयी।

भागीरथ के महान प्रयासों की सभी देवताओं और उनके पूर्वजों ने प्रशंसा की, और उनके इस कार्य को आज भी भगीरथ प्रयास (सभी बाधाओं के बावजूद कुछ महान कार्य करना ) के रूप में जाना जाता है।

Benefits of having a family

benefits of family in Hindi/ परिवार का महत्व

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benefits of family in Hindi/ परिवार का महत्व

आज हम सब का जीवन बहुत बदल गया है। प्रौद्योगिकी का विकास, नये सांस्कृतिक मानदंडों, नई प्राथमिकताओं और इंटरनेट के द्वारा प्रसारित संचार के नये और तेज माध्यमों ने आज की पीढी के जीवन जीने के तरीके में बहुत से बद्लाव लाये है। एक तरफ इन बदलावों ने जीवन को बहुत सरल बना दिया है। एक सेकेड मे अपनी कोई भी बात, कोई भी तस्वीर, यहा तक कि कोई भी गिफ्ट दुनिया के किसी भी कोने मे पहुंचा सकते है। अपनी जरुरत की चीजे खरीद्ने के लिये बाजार जाने की जरुरत नही। आपके  एक क्लिक् पर सब सामान  आपके  घर पर हाज़िर हो जाता है।

वही दूसरा पहलू  यह भी है कि हम अपने अपनों से ही दूर हो गये है।  आज हम अपने पडोसी का नाम तक नही जांनते। इस बदलते माहौल मे आज संयुक्त परिवार की प्रथा खत्म होती जा रही है। भले ही परिवार का स्वरूप बदल गया हो, पर यह आज भी महत्वपूर्ण संस्था है। इस बद्ले माहौल में “परिवार” का क्या महत्व है” आइए जांनते है।

परिवार की परिभाषा:  परिवार सामाजिक संरचना की एक मूल इकाई है।  अंग्रेज़ी का “family” शब्द एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “जीवन भर के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान एक साथ रहने वाले व्यक्तियों के समूह।“ यह  जैविक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संबंधों से एक-दूसरे से बंधे व्यक्तियों के समूह को संदर्भित करता है।

परिवार का आकार अलग-अलग  संस्कृतियों, समाज, देशों, और जातियो मे अलग हो सकता है। पारम्परिक संयुक्त भारतीय परिवार मे दो या दो से अधिक पीढीयो के लोग एक साथ एक छत के नींचे रह्ते थे, एक ही रसोई साझा करते थे । इसमेंदादा-दादी, मा-पिता, बच्चे, और भाईयों के साथ  मिलकर रहते थे। परन्तु अब ऐसे परिवार कम होते जा रहे है।  शहरीकरण और आधुनिकीकरण के कारण युवा पीढी पारंपरिक संयुक्त परिवार से दूर हो गयी है। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है, जिसमे पति –पत्नि और उंनके बच्चे रहते है।

स्वस्थ जीवन मे परिवार के लाभ :

जैसे-जैसे आधुनिक जीवन मे तनाव बढ्ता जा रहा है, एक परिवार में रहने का लाभ पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बाहरी चुनौतियों का सामना करना आसान हो जाता है जब हमारे पास एक परिवार होता है और, हमें  उनका सामना नहीं करना पड़ता है। आजकल देखा जाता है ,कि अकेले रहने वाले लोग अवसाद का शिकार हो जाते है।

खुशी और गम बाटने के लिये

क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपके पास  कोई अच्छी खबर है, लेकिन खबर बताने के लिए कोई भी नहीं? यहीं एक  परिवार की कमी खलती है । परिवार में हम अपने सुख दुख बता सकते है।  आजकल पारमपरिक त्योहार लोग भूलते जा रहे है।लोगो के पास समय नही है कि आने वाली पीढी को अपने संस्कृति, त्योहारो के बारे मे बता सके। ऐसे मे परिवार ही वह संस्था है जहां पर सब लोग मिलकर एक साथ हर त्योहार मनासकते है। इसमे अधिक संतुष्टि और ख़ुशी मिलती है। आपस मे एक दूसरे का सहयोग करने की भावना उत्त्पन्न होती है।

वित्तीय सुरक्षा

एक परिवार घर में रहने वाले हर किसी के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है। परिवार के कमाने वाले  सदस्य अपनी कमाई का एक हिस्सा का उपयोग परिवार में हर किसी की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं। दूसरा, परिवार में सभी घरेलु खर्चो के लिये,सब योगदान देते है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि परिवार मे  रहकर बच्चे यह सीखते है कि पैसे का प्रबंधन कैसे किया जाये और यह सीख  उंनके आगे के जीवन में बहुत काम आती है

बच्चे परिवार में नैतिक और धार्मिक मूल्य सीखते हैं

नैतिक और धार्मिक मूल्य सीखना परिवार का पारंपरिक कार्य रहा है। परिवार के माध्यम से बच्चे उस परिवार में चले आ रहे नैतिक और आध्यात्मिक विचारों से परिचित होते है जो कि उनके व्यक्तित्व विकास में बहुत सहायक होता है। परिवार एक तरह से पहला स्कूल है। परिवार के बडे सदस्य उन्हें प्यार, सम्मान, दोस्ती, ईमानदारी, दयालुता, साहस, समानता, अखंडता और जिम्मेदारी के मूल्य सिखाते हैं।

दोस्तों, जीवन मे हर व्यक्ति कभी न कभी बुरे और कठिन दौर से गुजरता है। हर कोई इंसान जाने-अंजाने गलती करता है, यह भूल कभी बडी भी हो सकती है, समाज के लिये भी गलत हो सकती है। जब आपको सबसे ज्यादा समर्थन की आवश्यकता होती है तो अन्य लोग आप से मूंह मोड़ सकते है\ ऐसे समय पर आपका परिवार ही आपका सहारा है। वे हमेशा आपके साथ है, भले ही वे आपकी गलती के लिये आपको सज़ा दे, लेकिन फिर सही रास्ते पर जाने की हिम्मत भी परिवार से ही मिलती है।

आपको यह लेख benefits of having a family कैसा लगा कृप्या comments में बताये .

अर्चना त्रिपाठी

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Phooldei festival of Uttarakhand फूलदेई: घोघा का त्योहार 

फूलदेई: त्योहार

उत्तराखंड राज्य दुनिया भर में देवभूमि के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड राज्य न केवल प्राकृतिक परिदृश्य और प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध है बल्कि इस प्रदेश की अपनी एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी है। यहॉ की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराएं मुख्य रूप से धर्म और प्रकृति में निहित हैं। यहॉ के हर त्योहर में प्रकृति का महत्व झलकता है। इसी क्रम मे एक त्योहार है- फूलदेई।

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फूलदेई उत्तराखंडी परम्परा और प्रकृति से जुड़ा सामाजिक, सांस्कृतिक और लोक-पारंपरिक त्योहार है यह त्योहर चैत्र संक्रांति -चैत्र माह के पह्ले दिन से शुरू होता है और अष्टमी (आठ दिन) तक चलता है। इसे गढ्वाल मे घोघा कहा जाता है। पहाड के लोगों का जीवन प्रकृति पर बहुत निर्भर होता है, इसलिये इनके त्यौहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं। प्रकृति ने जो उपहार उन्हें दिया है, उसे वरदान के रूप मे स्वीकर करते है और उसके प्रति आभार वे अपने लोक त्यौहारों के माध्यम से प्रकट करते है।

फूलदेई त्योहार का संबंध भी प्रकृति के साथ जुडा है। यह बसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है, बसंत ऋतु में चारो और रंग बिरंगे फूल खिल जाते है, बसन्त के आगमन से पूरा पहाड़ बुरांस और की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। फिर चैत्र महीने के पहले दिन इतने सुंदर उपहार देंने के लिये गांव के सारे बच्चों के माध्यम से प्रकृति मां का धन्यवाद अदा किया जाता है। इस दिन छोटे बच्चे खासकर लड़कियां सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं। फिर बच्चे और महिलाये मिलकर घोघा देवता की डोली सजाते है। एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, और खेतों और जंगल से तोड़ कर लाये ताजे फूलों को सजाकर घोघा देवता की पूजा करते है और यह गीत गाते हुए बच्चे बारी-बारी से घोघा देवता की डोली को कंधे पर उठाकर नचाते हुए यह गीत गाते है :

फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई।
घोघा माता फ्युला फूल
दे दे माई दाल चौल

घोघ देवता की डोली और फूलों की थाली और डलिया लेकर बच्चो की टोली पूरे ग़ाव मे घर-घर पर जाती है” और हर घर की देहरी पर फूल डालते है, वे घर की समृद्धि के लिए अपनी शुभकामनाएं देते हैं। ये फूल अच्छे भाग्य के संकेत माने जाते हैं। महिलाए घर आये बच्चों का स्वागत करती है , उन्हे उप हार मे ,चावल, गुड़, और कुछ पैसे और आशीर्वाद देते है। इस तरह से यह त्योहार आठ दिन तक चलता है। आठ्वें दिन सारे बच्चे किसी एक घर या किसी सामुहिक स्थान पर उपहार मे मिले गुड़ चावल दाल आदि से हलवा और अन्य पारम्परिक व्यंजन बनाते है। इसमे बडे लोग भी उनकी मदद करते है। इस प्रसाद से सबसे पहले देवता को चढाया जाता है बाद में सभी को बॉटा जाता है। बच्चे बडे स्वाद से ये पकवान खाते हैं और सब गॉव वालों को खिलाते है। इस प्रकार प्रकृति –पूजा का यह फ़ूलदेई त्योहार चैत्र मास के आठ्वें दिन सम्पन्न हो जाता है।

इस प्रकार से प्रकृति को धन्यवाद कहने के साथ प्रकृति के इन रंगों (फूलों के रुप में) को अपनी देहरी पर सजाकर उत्तराखण्ड प्रकृति का अभिवादन करता है।

यह एक कटु सच्चाई है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ और आपाधापी में हम न जाने कितनी अच्छी परंपराओं और रिवाजों को भूल चुके हैं। लेकिन ऐसे अनेक परंपराएं थी जो निस्वार्थ थी, वे “वसुधैव कटुम्बकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का संदेश देती थीं। “फूल देई, फूल-फूल माई” उत्तराखंड की ऐसी ही एक बेजोड़ परंपरा है।

अर्चना

Mahatma Buddha stories in Hindi

Buddha  inspirational short stories in Hindi: भगवान बुद्ध के बारे में कई प्रेरक कथायें प्रचलित है। आज यहाँ  पर उनके जीवन से जुडी एक कहानी share कर रही हुँ।

एक बार भगवान बुद्ध के शिष्यों के साथ विराजमान थे । तभी  बाहर खड़ा एक व्यक्ति गुस्से से बोला,” आज मुझे सभा में बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी गई ?

बुद्ध  ध्यानमग्न रहे।  उस व्यक्ति ने चिल्लाकर फिर वही  सवाल किया।  एक शिष्य ने कहा “भगवान बाहर खडे उस  शिष्य को अंदर आने की अनुमति दीजिए।”

बुद्ध ने नेत्र खोलें और बोले,” नही , वह अछूत है।”

सभी शिष्य आश्चर्य से बुद्ध को देखने लगे, “भगवान आप तो जाति -पाति  का भेद नहीं मानते फिर वह अछूत कैसे?”

बुद्ध  ने कहा ,” आज यह क्रोध मेंं आया है।  क्रोध से एकाग्रता भंग होती है । क्रोध  मानसिक  हिंसा है, किसी भी कारण क्रोध  करने वाला अछूत  होता है।”

वक्त की 7 सीख : 7 quotes about time

“जब” “कोई” “तुम्हारा” “दिल” “दुखाये”… “तो” “चुप” “रहना” “बेहतर” “है”, “क्योंकि” “जिन्हें” “हम” “जवाब” “नहीं” “देते”… “उन्हें” *वक्त* “जवाब” “जरुर” “देता” “है”!!

“जीवन” “का” “सबसे” “बड़ा” “गुरु” *वक्त* “होता” “है”, “क्योंकि” “जो” *वक्त* “सिखाता” “है”… “वो” “कोई” “नहीं” “सीखा” “सकता”!!

 

 “अपनापन” “तो” “हर” “कोई” “दिखाता” “है”, “पर” “अपना” “कौन” “है”… “ये” “तो” *वक्त* “बताता” “है”!!

“किसी” “की” “मजबूरियाँ” “पे” “ना” “हँसिये”… “कोई” “मजबूरियाँ” “ख़रीद” “कर” “नहीं” “लाता”, “डरिये” *वक्त* “की” “मार” “से”… “बूरा” *वक्त* “किसी” “को” “बताकर” “नहीं” “आता”!!

“सदा” “उनके” “कर्जदार” “रहिये”, “जो” “आपके” “लिये”… “कभी” “खुद” “का” *वक्त* “नहीं” “देखते”!!

 *वक्त* “की” “यारी” “तो” “हर” “कोई” “करता” “है” “मेरे” “दोस्त”, “मजा” “तो” “तब” “है”… “जब” *वक्त* “बदल” “जाए” “और” “यार” “ना” “बदले”!!

“एक-दुसरे” “के” “लिये”… “जीने” “का” “नाम” “ही” “जिंदगी” “है”, “इसलिये” *वक्त* “उन्हें” “दो”… “जो” “तुम्हें” “चाहते” “हैं” “दिल” “से”!!

International mother language day

   21 फरवरी का दिन विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रुप में मनाया जाता है|  यूनेस्को ने सन 2000 से इस दिवस की शुरुआत की थी | विश्व में बहुभाषावाद तथा सांस्कृतिक विविधता को प्रसारित करने के लिए यह दिवस यूनेस्को द्वारा मनाया जाता है । मातृभाषा अपनी संस्कृति तथा विरासत को संजोए रखने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।  इस अवसर पर यहॉ हिंदी से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी शेयर कर रहे है।

  • हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में चौथे स्थान पर आती है।
  • यह एक आश्चर्य की बात है कि हिंदी स्वयं एक फारसी भाषा का शब्द है। हिंदी शब्द की उत्पत्ति सिंधु शब्द से हुई  है जो कालांतर में हिंदी नाम से जाना गया।
  • विश्व की अनेक अनेक भाषाओं की तरह हिंदी भाषा की जननी भी संस्कृत भाषा है। हिंदी भाषा को संस्कृत की उत्तराधिकारी भाषा भी माना जाता है ।
  • हिंदी भाषा  देवनागरी लिपि मे लिखी जाती है।
  • हिंदी भाषा का सहित्य  लगभग 1000 ईस्वी के आसपास से उपलब्ध होता है। उस समय यह अप्भ्रंश रूप मे प्रचलित थी।
  • 13वी सदी से 17वी सदी का समय हिंदी भाषा का स्वर्ण युग कहा जाता है। समस्त हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इस युग में प्राप्त होती हैं । सूरदास, कबीर, तुल्सीदास, रहीम, बिहारी, जैसे महान कवि इसी युग की देन है।
  • सन 1800 इस्वी के बाद से हिंदी का खडीबोल स्वरूप अस्तित्व मे आने  लगा। इसके बाद से अब तक का समय हिंदी साहित्य का आधुनिक काल माना जाता है।
  • भारतेंदू हरिश्चंद्र (1850-1885) को आधुनिक हिंदी का पितामह कहा जाता है। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया।
  • सन 1900 से लेकर 1950 तक हिंदी के अनेक रचनाकारों ने इसके विकास में योगदान दिया इनमे मुंशी प्रेमचंद ,जयशंकर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी , मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पन्त, महादेवी वर्मा आदि।
  • आज़ादी के बाद हिंदी को भारतीय संविधान के प्रावधान के अनुसार भारतीय गणराज की राजकीय भाषा घोषित किया गया।                                                                                                archana Tripathi