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गंगा दशहरा का महत्व और कहानी

ग़ंगा दशहरा का महत्व और कहानी

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चित्र साभार : गूगल

गंगा नदी को पवित्र और दिव्य नदी माना जाता है, हिंदू धर्म में इसे सिर्फ एक नदी ही नहीं, अपितु इस नदी को एक मॉ का स्थान दिया गया है। पुराणों और वेदों मेंं गंगा नदी को मोक्षदायिनी कहा गया है। गंगा का भारतीयों के जीवन में पौराणिक, ऐतिहासिक,धार्मिक और आर्थिक रूप से बहुत महत्व है। गंगा का पानी बहुत पवित्र माना जाता है और सभी हिंदू अनुष्ठानों के लिए हर किसी द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

पौराणिक हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि मा गंगा जेठ मास के शुक्ल पक्ष की दसवी तिथि को स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थी। अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार इस साल यह शुभ तिथि आज के दिन 24 मई 2018 को पड़ रही है। इस दिन को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है।

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क्या है गंगा दशहरा पर्व का महत्व और क्यों मनाया जाता है यह पर्व?

माना जाता है कि इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था।पुराणों में वर्णित है कि इसी दिन सुर्यवंशी राजा भगीरथ की बहुत कठिन तपस्या के बाद मॉ गंगा को नदी स्वरूप मे स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर लाने का मानवकल्याण रुपी कार्य पूर्ण हुआ था।तभी से हर साल गंगादशहरा के पावन अवसर पर गंगा पूजा के साथ कई संस्कार,रीतियों और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि गंगा दशहरा के अवसर पर्व पर माँ गंगा में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैसे तो गंगा स्नान का अपना अलग ही महत्व है, लेकिन इस दिन स्नान करने से मनुष्य सभी दुःखों से मुक्ति पा जाता है। गंगा दशहरा के दिन दान पुण्य का विशेष महत्व है।

गंगा के अवतरण की पौराणिक कहानी

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में सगर नाम के राजा हुए। राजा सगर की दो रानिया थी- केशानी और सुमति। दोनों मे से किसी भी रानी से राजा की कोई संतान न थी। संतान प्राप्ति के लिये राजा सगर ने कई यज्ञ, अनुष्टठान किये। जिसके फलस्वरूप रानी केशानी से एक पुत्र प्राप्त हुआ-असमजस और दूसरी रानी सुमति ने साठ हज़ार पुत्रों को जन्म दिया। कुछ साल बाद राजा सगर ने अपने राज्य विस्तार के लिये अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। प्रचलित यज्ञ विधान के अनुसार अश्व (घोडा) को पडोसी राज्यो की सीमाओंं की और खुला छोड दिया जाता था । यदि यज्ञ के अश्व को किसी अन्य राजा की सेना ने पकड लिया तो उसे युद्ध करना पड्ता था। और युद्ध में जो विजेता होता था उसका पराजित राज्य पर अधिकार हो जाता था। इस प्र्कार राजा सगर ने सभी राजाओं को बताने के लिये अश्व को मुक्त विचरण के लिये छोड दिया। यज्ञ की रक्षा का भार उनके साठ हज़ार पुत्रों ने संभाला। इंद्र देव नही चाह्ते थे कि यह यज्ञ सफल हो इस्लिये उन्होने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था. परिणामतः सगर के साठ हजार पुत्रों ने अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ ‘महर्षि कपिल’ वहा तपस्या कर रहे हैं. उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है. उन्हें देखकर वे ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगे और उनका ध्यान भंग कर दिया।

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई. ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सभी 60,000 पुत्र महर्षि कपिल के श्राप से भस्म हो गये। सगर के वंसज श्रापित हुए अपनेे पुर्वजों की मुक्त्ति का बहुत प्रयास किया। परन्तु किसी से यह सम्भव नही हुआ। आगे जाकर राजा सगर के वंश मेंं राजा भगीरथ उत्पन्न हिए ।

भगीरथ ने मृत पूर्वजो का श्राद करके उनका उद्धार कंरने का निश्चय किया। परंतु इस कार्य के लिये प्रयाप्त जल उपलब्ध नही था क्युकि श्राप के प्रभाव से जल के श्रोत भी सुख चुके थे। राजा भगीरथ ने अपने मृत पूर्वजों के उद्धार के लिये तथा प्रजा को अकाल से मुक्ति दिलाने के सैकडो वर्षो तक कठोर तप किया। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने ‘गंगा’ के धरती पर अवतरण की इच्छा प्रकट की।

इस पर ब्रह्मा ने कहा- ‘राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है. इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए.’ महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया

उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा. तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं. इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका।

अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई. उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया. तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया. इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी. इस प्रकार . गगा की पवित्र धारा के प्रवाह में सभी भगीरथ के सभी पूर्वजों की राख बह गयी और उन्हे श्राप से मुक्ति मिल गयी। मा गंगा के अवतरित होने सेे धरती फिर सेे हरी- भरी और उपजाऊ हो गयी और प्रजा भी सुखी हो गयी।

भागीरथ के महान प्रयासों की सभी देवताओं और उनके पूर्वजों ने प्रशंसा की, और उनके इस कार्य को आज भी भगीरथ प्रयास (सभी बाधाओं के बावजूद कुछ महान कार्य करना ) के रूप में जाना जाता है।

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